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Welcome to the World of Poetry

Tuesday, October 21

A man rare found

A godly person is one.
Who feels the pain of others;
Who shares anothres' sorrow,
And forever disdains pride.

One who respects the entire world,
Speaks not a word of evil against any person;
Who remains steadfast in word, body and mind.
Blessed is the mother who gives birth to such a child.

One who looks upon everyone as an equal and has renounced avarice,
And who honors women like their mother;
Whose tongue knows not the taste of falsehood till their last breath,
Nor covets another wealth.

One who does not desire worldly things,
And treads the path of renunciation.
Ever on their lips is God's holy name;
All place of pilgrimage are within them.

One who is not greedy and deceitful,
Has conquered lust and anger.
The author of this poem would be grateful to meet such a soul,
Whose virtue liberates their entire lineage.

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PC

Sunday, October 5

Lights Out

I have come to the borders of sleep,
The unfathomable deep
Forest where all must lose
Their way, however straight,
Or winding, soon or late;
They cannot choose.

There is not any book
Or face of dearest look
That I would not turn form now
To go into the unknown
I must enter and leave alone
I know not how.

Sunday, August 10

I AM WALKING ALONE

Tonight, as on other nights
I'm walking alone
through the valley of fear.
O God, I pray
that you will hear me:
for only you alone know
what is in my heart.
Lift me out of this valley of despair
and set my soul free.

I try to lift my soul so high
that nothing can touch it
where it lies.....
Bruised and crushed
lies my trust, faith and soul.

When my hour comes
I will not be afraid....
for I know
Your judgement will be
tempered with mercercy.
After all I am only clay
And one day
I shall return...
To the dust
From which I came.

Sunday, July 6

सपनों का ताजमहल



सपनों का ताजमहल बनाया था मैने ,
जिसमे वो मेरे शाहजहाँ ,
और मै उनकी मुमताज थी |

सितारों से सजा था आशियाना मेरा ,
और ख़ुशियो की फुहार थी |
लहरों सी हिचकोले खाती जिन्दगी में ,
पतझड़ नही ,केवल प्यार की बहार थी |

सपनों के पिरोये थे लाखो मोती मैने,
मेरी तमन्नाओ की माला तेयार थी |
बर्फ सी चादर में लिपटी हुई आशाएँ ,
बाहर आने को कब से बेकरार थी |

जब हकीकत से हुआ सामना मेरा , मैने पाया ,
अरे ! ये तो सपनों की सोगात थी |
जिन्दगी से हम भी खफा नही है अपनी से ,
आखिर ये ही तो मेरे लिए लायी रिश्तो की बोछार थी |

संगेमरमर का ताजमहल न सही ,
पर मैने भी बनाई प्यार की मीनार थी |
लाखो हसिनाओ से मिलते रहे वो हमेशा ,
पर उनके लिए मै ही उनकी मुमताज थी |

Saturday, July 5

अब तन्हा रहना सिख रहे है



अब तन्हा रहना सिख रहे है ,
मर कर जीना सिख रहे है |
मांग कर पाना सिख लिया ,
अब खो कर पाना सिख रहे है |
मदहोशियो ने खूब सताया हमे ,
अब होश में आना सिख रहे है |
याद में उनकी सदियों तक जगे ,
अब चैन से सोना सिख रहे है |
वो गये तो हाथ छोड़ कर ,
अब तन्हा रहना सिख रहे है |
हर बार मनाया उनको हमने ,
अब खुद को मनाना सिख रहे है |
सिखाया था उन्होंने हमे बाते बनाना ,
अब खामोश रहना सिख रहे है |
याद  न आये  उनकी अब ,
उनको भुलाना सिख रहे है |

Thursday, July 3

खामोशियाँ



मिला वो भी नही करते ,
मुलाकात हम भी नही करते |
दगा वो भी नही करते ,
धोखा हम भी नही करते |
उन्हें रुसवाई का दुःख ,हमे तन्हाई का डर ,
गिला वो भी नही करते ,
शिकवा हम भी नही करते |
किसी मोड़ पर मुलाकात हो जाती है ,
रुका वो भी नही करते ,
ठहरा हम भी नही करते |
जब भी देखते है उन्हें सोचते है कुछ कहें उनसे ,
सुना वो भी नही करते ,
कहा हम भी नही करते |
लेकिन ये भी सच है के महोब्बत उन्हें भी है हमसे ,
इकरार वो भी नही करते ,
इज़हार हम भी नही करते |